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बिजली बिल में बड़ा बदलाव संभव, कम खपत पर भी देना पड़ सकता है ज्यादा फिक्स्ड चार्ज

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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने बिजली टैरिफ व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। नए सुझाव के तहत फिक्स्ड चार्ज बढ़ सकता है, जिससे कम बिजली इस्तेमाल करने पर भी उपभोक्ताओं को ज्यादा बिल चुकाना पड़ सकता है।

देशभर के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाले समय में बिजली बिल की पूरी व्यवस्था बदल सकती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी सीईए की ओर से दिए गए नए सुझाव ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। प्रस्ताव के अनुसार अब बिजली बिल केवल खर्च की गई यूनिट पर आधारित नहीं रहेगा, बल्कि उसमें “फिक्स्ड चार्ज” यानी स्थायी मासिक शुल्क का हिस्सा काफी बढ़ाया जा सकता है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो कम बिजली इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी हर महीने ज्यादा बिल चुकाना पड़ सकता है। अभी तक लोग बिजली बचाकर अपने बिल को कम कर लेते थे, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह फायदा काफी हद तक सीमित हो सकता है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है।

क्या है फिक्स्ड चार्ज का पूरा मामला

बिजली बिल में दो तरह के शुल्क शामिल होते हैं। पहला वह शुल्क जो बिजली की खपत यानी यूनिट के हिसाब से लिया जाता है और दूसरा “फिक्स्ड चार्ज” या स्थायी शुल्क, जो हर महीने तय रहता है। अभी तक घरेलू उपभोक्ताओं के बिल में यूनिट आधारित शुल्क का हिस्सा ज्यादा होता है, जबकि फिक्स्ड चार्ज सीमित रखा जाता है।

लेकिन सीईए के नए सुझाव में कहा गया है कि बिजली वितरण कंपनियों के स्थायी खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में फिक्स्ड चार्ज का हिस्सा बढ़ाना जरूरी हो गया है ताकि बिजली कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें।

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि यह बदलाव लागू हुआ तो उपभोक्ता चाहे कम बिजली खर्च करें या ज्यादा, उन्हें हर महीने एक तय राशि चुकानी ही पड़ेगी। इससे बिजली बचाने की आदत का आर्थिक फायदा पहले जैसा नहीं रह जाएगा।

क्यों बढ़ाना चाहती हैं बिजली कंपनियां शुल्क

देश की कई सरकारी बिजली वितरण कंपनियां लंबे समय से घाटे में चल रही हैं। बिजली कंपनियों का कहना है कि उन्हें बिजली सप्लाई बनाए रखने के लिए भारी खर्च उठाने पड़ते हैं। इसमें ट्रांसमिशन लाइन, बिजली ग्रिड, कर्मचारियों का वेतन, रखरखाव और बिजली उत्पादन कंपनियों को भुगतान जैसे स्थायी खर्च शामिल हैं।

बिजली कंपनियों के अनुसार इन खर्चों का बड़ा हिस्सा तय होता है और यह बिजली की खपत कम होने पर भी कम नहीं होता। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उनकी आय मुख्य रूप से बिजली खपत पर निर्भर रहती है। ऐसे में जब उपभोक्ता कम बिजली इस्तेमाल करते हैं तो कंपनियों की कमाई घट जाती है, जबकि खर्च लगभग समान बना रहता है।

यही कारण है कि अब कंपनियां स्थायी शुल्क का हिस्सा बढ़ाने की मांग कर रही हैं ताकि उन्हें हर महीने निश्चित आमदनी मिलती रहे।

सोलर सिस्टम ने भी बदला पूरा गणित

रिपोर्ट्स के अनुसार देशभर में तेजी से लोग रूफटॉप सोलर सिस्टम अपना रहे हैं। घरों और फैक्ट्रियों में सोलर पैनल लगने से लोग सरकारी बिजली पर कम निर्भर हो रहे हैं। दिन के समय कई उपभोक्ता अपनी जरूरत की बिजली खुद पैदा कर लेते हैं।

हालांकि जरूरत पड़ने पर वे फिर भी बिजली ग्रिड का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में बिजली कंपनियों को पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर चालू रखना पड़ता है, लेकिन कम खपत की वजह से उनकी आय घट जाती है।

सीईए का मानना है कि सोलर उपभोक्ताओं के लिए भी अलग बिलिंग व्यवस्था जरूरी है ताकि बिजली कंपनियों को नुकसान न हो। इसी कारण प्रस्ताव में सोलर उपभोक्ताओं पर भी ज्यादा फिक्स्ड चार्ज लगाने की बात कही गई है।

घरेलू उपभोक्ताओं पर कितना असर पड़ेगा

प्रस्ताव के अनुसार वर्ष 2030 तक घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं के कुल बिजली बिल में फिक्स्ड चार्ज का हिस्सा बढ़ाकर 25 प्रतिशत तक किया जा सकता है। यानी हर महीने बिल का एक बड़ा हिस्सा स्थायी शुल्क के रूप में लिया जाएगा।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी उपभोक्ता का वर्तमान बिल कम यूनिट खर्च करने की वजह से 500 रुपये आता है, तो भविष्य में उसमें तय शुल्क बढ़ने के कारण बिल ज्यादा हो सकता है, भले ही बिजली की खपत कम ही क्यों न हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और कम खपत वाले उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। क्योंकि अभी तक ऐसे लोग बिजली बचाकर बिल कम करने में सफल रहते थे।

दुकानों और उद्योगों पर और ज्यादा बोझ

सीईए के प्रस्ताव में दुकानों, फैक्ट्रियों और व्यावसायिक संस्थानों के लिए फिक्स्ड चार्ज का हिस्सा 100 प्रतिशत तक बढ़ाने की सिफारिश की गई है। यानी इन उपभोक्ताओं को हर महीने भारी स्थायी शुल्क देना पड़ सकता है।

यदि ऐसा हुआ तो छोटे कारोबारियों और उद्योगों की लागत बढ़ सकती है। व्यापारिक संगठनों का मानना है कि इससे छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ेगा और महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।

बिजली बचत का फायदा हो सकता है कम

अब तक सरकारें ऊर्जा बचत को बढ़ावा देती रही हैं और लोग भी बिजली कम खर्च कर अपने बिल को नियंत्रित करते थे। लेकिन यदि फिक्स्ड चार्ज का हिस्सा बढ़ता है तो बिजली बचाने का सीधा आर्थिक फायदा कम हो सकता है।

हालांकि ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली बचत का महत्व फिर भी बना रहेगा क्योंकि यूनिट आधारित शुल्क पूरी तरह खत्म नहीं किया जाएगा। लेकिन कुल बिल में स्थायी शुल्क बढ़ने से बचत का असर सीमित हो जाएगा।

राज्यों में लागू होने से पहले होगी समीक्षा

सीईए ने फिलहाल यह सुझाव दिया है। अब इस प्रस्ताव को विभिन्न नियामक संस्थाओं और राज्य विद्युत नियामक आयोगों के पास भेजा जाएगा। वहां समीक्षा और चर्चा के बाद अलग-अलग राज्यों में इसे लागू करने पर फैसला लिया जाएगा।

यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो आने वाले वर्षों में देश की बिजली बिल व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इसका असर सीधे करोड़ों घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

फिलहाल आम लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार और नियामक संस्थाएं इस प्रस्ताव पर क्या फैसला लेती हैं। क्योंकि यदि फिक्स्ड चार्ज बढ़ता है तो आने वाले समय में हर महीने का बिजली बिल लोगों के घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

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